भारत नई दवाओं की खोज में कहां गलती कर रहा है?
नई दिल्ली, भारत – नई दवाओं की खोज में भारत की असफलताओं के पीछे एक बड़ा कारण बीमारी की बुनियादी जैविकी को पूरी तरह समझने में कमी है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह स्थिति देश में स्वास्थ्य अनुसंधान की दिशा और रणनीति में कई गहरे अंतरालों को दर्शाती है।
बीमारियों की बुनियादी जैविकी के ज्ञान के बिना नई दवाओं का विकास करना बेहद मुश्किल होता है। हालांकि भारत के कई शोधकर्ताओं ने इस क्षेत्र में प्रयास किए हैं, लेकिन देश की उपलब्धियाँ पश्चिमी देशों की तुलना में बहुत कम हैं। इसका प्रमुख कारण है कि भारतीय वैज्ञानिक अक्सर पश्चिमी आबादी से प्राप्त जैविक डेटा पर निर्भर करते हैं, जो स्थानीय संदर्भ के लिए पूरी तरह उपयुक्त नहीं होता।
इसके अलावा क्रांतिकारी शोध और स्थानीय बुनियादी विज्ञान को समर्थन देने वाली संस्थागत नीतियाँ भी कमजोर हैं। भारतीय शोध संस्थान और विश्वविद्यालय अक्सर अपनी सीमित संसाधनों के कारण गहरे और व्यापक अध्ययन नहीं कर पाते। इस स्थिति में, उद्योग और सरकार को अनुसंधान पर पर्याप्त निवेश बढ़ाने की आवश्यकता है, जिससे स्थानीय स्तर पर उत्पन्न ज्ञान विकसित हो सके और प्रभावी दवाओं का निर्माण हो सके।
विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर भारत नई दवाओं की खोज में सफल होना चाहता है, तो उसे अपनी स्थानीय जैविक विविधता और रोगों की प्रकृति के आधार पर गहन शोध करना होगा। एसओसीआईओ-कॉमिकल पहलुओं को भी ध्यान में रखते हुए, भारतीय स्वास्थ्य क्षेत्र को घरेलू स्तर पर विश्वसनीय और सटीक डेटा जुटाने की जरूरत है।
यहां तक कि सरकारी नीति निर्माताओं को भी आधारभूत वैज्ञानिक शोध के महत्व को समझते हुए अधिक वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान करनी होगी। केवल तभी भारत अपने जैव मेडिकल क्षेत्र में स्वायत्तता हासिल कर सकेगा और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर पाएगा।
इस दिशा में ज्यादा समर्पित प्रयास और संसाधन आवंटन के अभाव में भारत नई दवाओं की खोज के अपने लक्ष्यों तक नहीं पहुंच पाएगा, जिससे देश की स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र की प्रगति बाधित होगी।
