निर्माण बूम से कार्बन उत्सर्जन बढ़ाने वाली अर्थव्यवस्थाओं में भारत शामिल

India among economies driving carbon surge from construction boom

नई दिल्ली, भारत – विश्व स्तर पर भवन और निर्माण क्षेत्र की तेजी से बढ़ती गतिविधियाँ अब पर्यावरण के लिए एक बड़ा संकट बन गई हैं। हाल में प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार, यह क्षेत्र वैश्विक कार्बन उत्सर्जन का लगभग 37 प्रतिशत हिस्सा है। इसके साथ ही, यह क्षेत्र वैश्विक सामग्री निकासी का लगभग 50 प्रतिशत उपयोग कर रहा है, जो किसी भी अन्य सेक्टर की तुलना में सबसे अधिक है। इसके अतिरिक्त, इस क्षेत्र द्वारा विश्व की कुल ऊर्जा खपत का 28 प्रतिशत हिस्सा प्रयोग किया जाता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं में तेजी से बढ़ रहे निर्माण कार्यों के कारण यह आंकड़े लगातार बढ़ रहे हैं। भारत जैसे देश जहां शहरीकरण की गति बहुत तेज है, वहां इस क्षेत्र का पर्यावरणीय प्रभाव विशेष रूप से चिंता का विषय है।

कार्बन उत्सर्जन में इस वृद्धि के पीछे मुख्यत: निर्माण में उपयोग की जाने वाली सामग्री जैसे सीमेंट, स्टील, और अन्य संसाधनों का उत्पादन है। सीमेंट उत्पादन में भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड निकलती है, जो ग्रीनहाउस गैसों में सबसे प्रमुख है। इसके अलावा, भवनों की डिजाइन और निर्माण प्रक्रिया में ऊर्जा दक्षता की कमी भी इस उत्सर्जन में योगदान देती है।

पर्यावरणविद और नीति निर्माताओं का मानना है कि यदि हम वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखना चाहते हैं तो निर्माण क्षेत्र में सुधार आवश्यक है। इसमें ऊर्जा-कुशल भवनों का निर्माण, पर्यावरण के अनुकूल सामग्री का प्रयोग और निर्माण प्रक्रिया में आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल शामिल है।

भारत सरकार ने भी इस दिशा में विभिन्न पहलें शुरू की हैं जैसे कि ऊर्जा संरक्षण भवन कोड (ECBC), स्मार्ट सिटी परियोजनाएँ और नवीकरणीय ऊर्जा के प्रयोग को बढ़ावा देना। इन कदमों से उम्मीद है कि निर्माण क्षेत्र की ऊर्जा खपत और कार्बन फुटप्रिंट को कम किया जा सकेगा।

वैश्विक स्तर पर, निर्माण उद्योग के प्रमुख खिलाड़ी भी सतत विकास के लिए तकनीकी नवाचारों और हरित निर्माण तकनीकों को अपना रहे हैं। रिसाइक्लिंग समारोह, नवीनीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का इस्तेमाल और पर्यावरण की दृष्टि से बेहतर डिज़ाइन इन पहलों में शामिल हैं।

समाप्त करने के लिए, भवन और निर्माण क्षेत्र की इस विशाल ऊर्जा खपत और पर्यावरणीय प्रभाव को कम करना विश्व समुदाय के लिए एक बड़ी चुनौती है। इसके लिए सभी देश, विशेष रूप से विकासशील अर्थव्यवस्थाओं, को मिलकर काम करना होगा ताकि सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण के लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सके।

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