पश्चिमी घाट में हरे रंग के गुटखा में स्वतः-सफाई की प्रक्रिया पर नया अध्ययन
पुणे, महाराष्ट्र – हाल ही में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया है कि पश्चिमी घाट में पाए जाने वाले हरे रंग के गुटखा (मिलिपीड) की बाहरी कंकाल या एक्सोस्टीलेटन में अत्याधुनिक जल-विरोधी (हाइड्रोफोबिक) गुण मौजूद हैं। यह नई खोज जीव विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण मानी जा रही है और इससे प्राकृतिक सफाई प्रक्रिया की समझ में नयापन आया है।
अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता डॉ. रंजीत पाटिल ने बताया कि इस गुटखे की सतह में ऐसे सूक्ष्म संरचनात्मक तत्व पाए गए हैं जो पानी और गंदगी को प्रभावशाली रूप से हटाते हैं। उनका कहना है, “हमें मिला है कि गुटखे का एक्सोस्टीलेटन स्वयं को स्वच्छ रखता है, जिससे यह प्राकृतिक आवास में लंबे समय तक स्वच्छ और स्वस्थ रहता है।”
शोध टीम ने खास तरकीबों से गुटखे की सतह पर जल व सतह तनाव संबंधी परीक्षण किए, जिनसे यह तथ्य पुष्ट हुआ कि इस जीव की त्वचा पर जल की बूंदें बिना चिपके फिसल जाती हैं। इससे मिट्टी, पानी और अन्य कण गुटखे की सतह से आसानी से हट जाते हैं।
वैज्ञानिकों का मानना है कि इस प्राकृतिक हाइड्रोफोबिक गुण का अध्ययन कर जैविक तथा पर्यावरणीय क्षेत्र में नई तकनीक विकसित की जा सकती है। उदाहरण के लिए, स्वच्छता से जुड़ी मशीनों तथा कपड़ों में जलरोधी तकनीक को बेहतर बनाने के लिए इसका उपयोग किया जा सकता है।
पश्चिमी घाट की जैवविविधता के संबंध में यह खोज और भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि यहाँ के पारिस्थितिक तंत्र में मिलिपीड़ जैसी छोटी प्रजातियाँ भी एक बड़ा ecological role निभाती हैं। ये जीव न केवल मिट्टी को उपजाऊ बनाते हैं बल्कि उनके जीव रासायनिक गुण भी अक्सर जैव प्रौद्योगिकी के लिए संसाधन सिद्ध होते हैं।
इस अध्ययन के परिणाम भारतीय और विश्व स्तर पर पर्यावरण और जीवविज्ञान विशेषज्ञों के बीच चर्चा का विषय बने हैं। शोध पत्र में बताया गया है कि हरे रंग के इस मिलिपीड के एक्सोस्टीलेटन की संरचना का विस्तृत अध्ययन कर भविष्य में अन्य जीवों में भी इसी प्रकार के गुणों को खोजने पर ध्यान दिया जाएगा।
इस शोध का प्रकाशन हाल ही में एक प्रमुख नागरिक विज्ञान पत्रिका में हुआ है, जिसने इसे पर्यावरणीय विज्ञान में एक नया अध्याय बताया है। यह उपलब्धि भारतीय जैव विज्ञान अनुसंधान के क्षेत्र में एक अहम कदम मानी जा रही है।
