निकोबार निवासी तीन वन्यजीव अभयारण्यों के प्रस्ताव का विरोध करते हैं
कोलकाता, पश्चिम बंगाल। निकोबार के आदिवासी परिषद ने केंद्र सरकार द्वारा लिटिल निकोबार, मेरो और मेंचल द्वीपों पर प्रस्तावित तीन वन्यजीव अभयारण्यों के फैसले का खुलकर विरोध किया है। परिषद का कहना है कि इन अभयारण्यों की योजना बनाते समय स्थानीय निवासियों की पूरी तरह से अनदेखी की गई है और उनसे कोई परामर्श भी नहीं किया गया।
आदिवासी परिषद ने कहा है कि इस प्रकार के निर्णयों का मूलाधार स्थानीय समुदायों की भागीदारी और सहमति होनी चाहिए, क्योंकि स्थानीय व्यक्ति ही अपने पर्यावरण और संसाधनों के बेहतर संरक्षक होते हैं। परिषद ने बताया कि केंद्र सरकार द्वारा जो प्रस्तावित अभयारण्य बनाए जाने की योजना है, उससे स्थानीय लोगों के जीवन यापन, पारंपरिक अधिकार और आजीविका पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
निकोबार द्वीप समूह में रह रहे आदिवासी समुदायों का कहना है कि वन्यजीवों के संरक्षण की आवश्यकता समझते हुए भी योजनाओं में स्थानीय परंपराओं और हितों का सम्मान किया जाना चाहिए। उन्होंने केंद्र सरकार से पुनः विचार करने और सभी संबंधित पक्षों के साथ यथार्थपरक संवाद स्थापित करने की अपील की है।
सरकार की ओर से अभी तक इस विषय पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि वन्यजीव अभयारण्यों का गठन आवश्यक है, लेकिन इसकी प्रक्रिया पारदर्शी और सभी हितधारकों की सहमति से होनी चाहिए। इसके बिना किसी भी योजना को लागू करना संघर्ष और विरोध का कारण बन सकता है।
निकोबार में पारंपरिक समुदायों के अधिकारों को लेकर यह मामला अब केंद्र और स्थानीय प्रशासन के बीच एक बड़ी राजनीतिक चुनौती बनता दिख रहा है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि उनकी आजीविका और सांस्कृतिक पहचान के बिना कोई भी संरक्षण योजना स्थायी सफलता नहीं पा सकती। इसलिए वे चाहते हैं कि सरकार स्थानीय समुदायों को योजना प्रक्रिया में शामिल करे और उनके हितों की रक्षा करे।
आने वाले समय में इस विवाद का समाधान कैसे निकलेगा, यह देखने वाली बात होगी। फिलहाल परिस्थितियाँ बहुत संवेदनशील बनी हुई हैं और सभी की उम्मीद है कि संवाद के माध्यम से इस मुद्दे का शांतिपूर्ण समाधान निकलेगा।
