नागरिकों को आघात देखभाल का अधिकार जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा: सर्वोच्च न्यायालय

Right to trauma care of citizens integral part of right to life: Supreme Court

नई दिल्ली, भारत

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा कि नागरिकों को आघात देखभाल का अधिकार उनके जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। न्यायमूर्ति जे.के. महेश्वरी और न्यायमूर्ति ए.एस. चंदुरकर की बेंच ने राज्यों को निर्देश दिया है कि वे मासिक बैठकों का आयोजन करें और उसकी मिनट्स संबंधित पोर्टलों पर अपलोड करें ताकि समय-समय पर अनुपालन की रिपोर्ट उपलब्ध कराई जा सके।

इस आदेश से यह स्पष्ट होता है कि सरकार के लिए समयबद्ध और सुनियोजित व्यवस्था बनाना आवश्यक है ताकि घायल या आघात ग्रस्त मरीजों को उचित उपचार तुरंत मिले। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया है कि राज्यों द्वारा उठाए गए कदमों पर नजर रखी जाएगी और नियत तारीख पर रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी, जिससे ट्रॉमा केयर व्यवस्था में सुधार हो सके।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में ट्रॉमा केयर प्रणाली में सुधार के लिए यह कदम बहुत आवश्यक था क्योंकि सड़क हादसों और आकस्मिक चोटों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। सही समय पर शुरुआती उपचार ही मरीजों के जीवन रक्षा में निर्णायक भूमिका निभाता है।

इस निर्देश के बाद राज्यों को अपनी स्वास्थ्य प्रणालियों को मजबूत करना होगा और ऐसी व्यवस्थाएँ करनी होंगी जहाँ आघात ग्रस्त मरीजों को तुरंत प्राथमिक और त्वरित इलाज मिल सके। न्यायालय ने कहा कि यह अधिकार नागरिकों के मौलिक अधिकारों में सम्मिलित है इसलिए इसका पूर्ण और प्रभावी पालन आवश्यक है।

सरकार के लिए यह आदेश चुनौतीपूर्ण भी हो सकता है क्योंकि इसे पालन में कई विभागों को समन्वित प्रयास करने होंगे। खासतौर पर उन राज्यों में जहाँ स्वास्थ्य सेवाएँ अभी भी सर्वसुलभ नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भरोसा जताया है कि राज्यों द्वारा नियमित बैठकें और रिपोर्टिंग प्रक्रिया इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

ट्रॉमा देखभाल से जुड़े विशेषज्ञों ने कहा कि इस पहल से ना केवल मरीजों को बेहतर सेवा मिलेगी बल्कि दुर्घटनाओं के बाद मृत्यु दर में भी कमी आ सकती है। इसके साथ ही यह व्यवस्था प्रशासनिक जवाबदेही भी बढ़ाएगी जिससे स्वास्थ्य सेवाएँ और अधिक प्रभावी बनेंगी।

इस फैसले से भारतीय न्यायपालिका ने एक बार फिर मानव जीवन की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है और नागरिकों के स्वास्थ्य अधिकारों को मजबूती से संजोने का प्रयास किया है।

आगे के विकास और राज्यों द्वारा अनुपालन के सतत् मूल्यांकन पर देश की नजर होकर रहेगा, जिससे ट्रॉमा केयर की गुणवत्ता में निरंतर सुधार हो सके। यह आदेश स्वास्थ्य क्षेत्र में न्यायपालिका की चेतना और गंभीरता का परिचायक है।

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