जापान के रक्षा प्रमुख ने सुरक्षा बैठक में चीन पर साधा निशाना

Japan Defence Chief takes swipe at China at security meet

टोक्यो, जापान – प्रधानमंत्री साना ताका इचि के नेतृत्व में जापान ने अपनी रक्षा नीति को पहले से कहीं अधिक सक्रिय बनाया है। दूसरी विश्व युद्ध के बाद से अपनाई गई शांति वादी धारणा को पूरी तरह से छोड़ते हुए, जापान अब सुरक्षा और रक्षा के क्षेत्र में अमेरिका के सहयोग से अधिक सक्रिय और प्रगतिशील कदम उठा रहा है।

प्रधानमंत्री ताका इचि की सरकार ने रक्षा बजट में लगातार वृद्धि की है और इसके साथ ही नई तकनीकियों और हथियार प्रणालियों को शामिल करने में तेजी दिखाई है। यह बदलाव न केवल जापान की अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए है, बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा एवं स्थिरता के लिए भी अहम माना जा रहा है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि चीन के बढ़ते सैन्य प्रभाव और दक्षिणी चीन सागर तथा पूर्वी एशिया में विवादित क्षेत्रों में उसकी आक्रामक नीति के कारण यह बदलाव आवश्यक हो गया है। जापान अपने गिरोह देशों एवं क्षेत्रीय साझीदारों के साथ मिलकर सामरिक संतुलन बनाना चाहता है।

सुरक्षा विशेषज्ञ डॉ. हिरोशी यामाडा के अनुसार, “जापान की इस नीति का उद्देश्य केवल सुरक्षा सुनिश्चित करना नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को बनाए रखना भी है। अमेरिका के साथ सहयोग इसके प्रमुख स्तंभों में से एक है।”

हालांकि यह बदलाव जापान के पारंपरिक शांति-संबंधी संविधान के कुछ प्रावधानों को संशोधित कर सकता है, लेकिन सरकार का मानना है कि वर्तमान वैश्विक संदर्भ और बढ़ती सुरक्षा चुनौतियों के मद्देनजर ये कदम आवश्यक हैं। विपक्षीय पार्टियां इस पर विभिन्न दृष्टिकोण रखती हैं, लेकिन आम जनता में सुरक्षा को लेकर बढ़ती जागरूकता इस बदलाव का समर्थन करती दिख रही है।

इस नई रक्षा नीति के अंतर्गत जापान ने क्षेत्रीय सहयोग को भी बढ़ावा दिया है, जिसमें इंडो-पैसिफिक क्षेत्रों के देशों के साथ मिलकर संयुक्त सैन्य अभ्यास और खुफिया साझा करना शामिल है। यह रणनीति चीन की बढ़ती सेना के खिलाफ बैलेंस बनाने के प्रयास के रूप में देखी जा रही है।

सारांशत: जापान की यह सक्रिय रक्षा नीति क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। प्रधानमंत्री साना ताका इचि की सरकार ने न केवल अपनी सैन्य तैयारियों को मजबूत किया है, बल्कि क्षेत्रीय भागीदारों के साथ सामरिक सहयोग को भी सुदृढ़ किया है। यह रणनीति आने वाले वर्षों में एशिया-प्रशांत क्षेत्र के भू-राजनीतिक परिदृश्य को प्रभावित कर सकती है।

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