पोप लियो XIV ने पादरी स्वयं की दासता को वैधता देने में भूमिका के लिए ऐतिहासिक माफी मांगी
वाटिकन सिटी, इटली – पोप लियो XIV ने बुधवार को एक ऐतिहासिक सार्वजनिक माफी जारी की, जिसमें उन्होंने पोंक के पूर्व पोपों द्वारा यूरोपीय शासकों को ‘आस्तिकों के अलावा अन्य लोगों’ को दास बनाने और उनके शोषण को वैध ठहराने के अधिकार देने की भूमिका को स्वीकार किया। यह पहला मौका है जब किसी पोप ने इस गंभीर विषय पर अपनी जिम्मेदारी को स्वीकार किया है।
इतिहास में यह बात आम रही है कि कई पोपों ने ट्रांस-अटलांटिक दास व्यापार में कई यूरोपीय राज्यों और क्रिश्चियन देशों के योगदान के लिए खेद प्रकट किया है, लेकिन दासता को वैध ठहराने और प्रोत्साहित करने में चर्च के अपने संस्थागत भागीदारी को स्वीकृति नहीं दी गई थी। पोप लियो XIV ने इस बहुप्रतीक्षित बयान में साफ किया कि यह भूमिका भी चर्च के इतिहास का काला अध्याय है, जिसके लिए वे आधिकारिक तौर पर माफी मांगते हैं।
पोप ने कहा, “चर्च, जो हमेशा मानवता, गरिमा और स्वतंत्रता की रक्षक रही है, ने अतीत में गलत तरीके से अपने आधिकारिक धार्मिक आदेशों के जरिए दासता के गुनाह में भागीदारी की है। हम इस काले इतिहास को भूल नहीं सकते, बल्कि उससे सीखें और भविष्य के लिए सुधार करें।”
विशेषज्ञों के अनुसार, 15वीं और 16वीं सदी में पोपों द्वारा जारी किए गए कई धार्मिक आदेशों और बुलेटिनों ने यूरोपीय साम्राज्यों को उपनिवेश स्थापित करने और वहां के लोगों को दास बनाने की अनुमति दी थी। इनमें मुख्यत: अमेरिका के स्वदेशी लोगों और अफ्रीकी लोगों को निशाने पर रखा गया था। इस निर्णय ने वर्षों तक लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित किया।
धार्मिक इतिहासकार डॉ. सुमिता बहल ने बताया, “यह पहली बार है जब वाटिकन ने इस मुद्दे पर विवादास्पद और दर्दनाक सच्चाई को पूरी तरह स्वीकार किया है। इससे दुनिया को यह संदेश मिलेगा कि चर्च अपने इतिहास की गलतियों से सीखने और उन्हें सुधारने के लिए प्रतिबद्ध है।”
हालांकि इस माफी ने व्यापक स्वागत हासिल किया है, कुछ समूहों ने इसे काफी देर से और प्रतीकात्मक करार दिया है। कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि चर्च को अब न केवल माफी मांगनी चाहिए, बल्कि इस ऐतिहासिक अत्याचार के पीड़ितों और उनके वंशजों के लिए पुनर्वासात्मक कदम भी उठाने चाहिए।
पोप लियो XIV के इस बयान को आर्ट ऑफ़ हिस्ट्री और सामाजिक न्याय पाठ्यक्रमों में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है। यह माफी न केवल धार्मिक महत्व रखती है बल्कि वैश्विक समुदाय में पूर्वाग्रह और नस्लवाद के खिलाफ लड़ाई में भी एक नया अध्याय जोड़ती है।
इसके साथ ही, वाटिकन ने यह भी संकेत दिया है कि भविष्य में वे ऐसे अन्य इतिहास के काले पन्नों पर भी समीक्षा और माफी की प्रक्रिया चलाएंगे, ताकि समाज में न्याय और समानता की भावना मजबूत हो सके।
