जंगली पौधे से समृद्धि: असम की महिलाओं ने गैंडा अभयारण्य के पास बनाए जलकुम्भी से रोजगार
नारायणपुर, असम — असम के सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को वैकल्पिक रोजगार के साधन उपलब्ध कराना न केवल उनकी आर्थिक स्थिति सुधारने में मदद करता है, बल्कि लैओखोवा-बुरहाचापोरी वन्यजीव अभयारण्य के संरक्षण में भी सहायक साबित होता है। यह क्षेत्र गैंडा जैसे दुर्लभ और संरक्षित वन्यजीवों का निवास स्थल है, जहाँ पर्यावरण की सुरक्षा सर्वोपरि है।
अभयारण्य के आसपास के समुदाय अक्सर प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर रहते हैं, जिससे वन्यजीव और मानवीय गतिविधियों के बीच संघर्ष उत्पन्न हो जाता है। इस समस्या का समाधान निकालने के लिए स्थानीय प्रशासन और कई गैर-सरकारी संगठनों ने मिलकर जलकुम्भी (वॉटर हाइसिन्थ) को रोजगार का माध्यम बनाया है। जलकुम्भी, जिसे कई बार स्थानीय जल स्रोतों में कष्टप्रद जंगली पौधा माना जाता है, यहां एक संभावनाशील संसाधन के रूप में उभरा है।
महिलाएं, जो पहले रोजगार के अवसरों की कमी के कारण संघर्ष कर रही थीं, अब जलकुम्भी से उत्पाद बनाकर अपनी आजीविका चला रही हैं। यह पौधा आसानी से उपलब्ध होता है और इससे बने उत्पादों की मांग धीरे-धीरे बढ़ रही है। इससे न सिर्फ उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है, बल्कि जलकुम्भी के अत्यधिक प्रसार से जल स्रोतों की सफाई भी हुई है, जिससे स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को लाभ मिला है।
अधिकारियों के अनुसार, इस पहल से स्थानीय लोगों को स्थायी आय प्राप्त हो रही है, जिससे वे पर्यावरण संरक्षण में 적극 भूमिका निभा रहे हैं। वन विभाग के सहयोग से प्रशिक्षित महिलाओं ने जलकुम्भी के हस्तशिल्प उत्पादों के निर्माण में दक्षता हासिल की है, जो बाजार में लोकप्रिय हो रहे हैं।
यह परियोजना न केवल आर्थिक रूप से सशक्त बनाने वाली है, बल्कि पर्यावरण और वन्यजीवों के संरक्षण का मॉडल भी प्रस्तुत करती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि सीमावर्ती इलाकों में इस तरह के कार्यक्रमों को बढ़ावा देने से वन्यजीव संरक्षण प्रयासों को मजबूती मिल सकती है। स्थानीय समुदाय जब खुद को संरक्षण के हिस्से के रूप में देखेंगे, तो वे जंगली जानवरों और उनके आवास की सुरक्षा का बेहतर ख्याल रखेंगे।
इस सफल पहल के चलते असम का लैओखोवा-बुरहाचापोरी वन्यजीव अभयारण्य एक बेमिसाल उदाहरण बन गया है कि कैसे सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय हितों को संतुलित करके स्थायी संरक्षण सुनिश्चित किया जा सकता है। भविष्य में भी ऐसी योजनाएं स्थानीय लोगों के जीवन स्तर सुधारने और वन्यजीव संरक्षण को बढ़ावा देने में निर्णायक भूमिका निभाएंगी।
