मेोपिया महामारी: बदलती बचपन की ज़िंदगी हमारे भविष्य को धुंधला कर रही है
नई दिल्ली, भारत – आज के बच्चे प्राकृतिक धूप में बहुत कम समय बिताते हैं और अधिकतर समय स्कूल, ट्यूशन या स्क्रीन के सामने बिताते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, इस जीवनशैली के परिवर्तनों से कमजोर जेनेटिक बुनियादी वाले बच्चों में निकट दृष्टि (मेोपिया) की संख्या तेजी से बढ़ रही है।
शोध बताते हैं कि जब बच्चे प्राकृतिक रोशनी में पर्याप्त समय नहीं बिताते, तो उनकी आंखों की मांसपेशियाँ कमजोर पड़ने लगती हैं, जिससे दूर की वस्तुएं धुंधली दिखने लगती हैं। इसके परिणामस्वरूप, बच्चों में नजर की समस्या विशेष रूप से बढ़ रही है। इस बढ़ोतरी के कारणों में मोबाइल, टीवी, कंप्यूटर और टैबलेट जैसे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का अत्यधिक उपयोग भी शामिल है।
नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. संजय मेहता के अनुसार, “बच्चों के लिए दिन में कम से कम दो घंटे खुले आसमान के नीचे बिताना अत्यंत आवश्यक है। इससे उनकी आँखों की मांसपेशियाँ संतुलित स्थिति में रहती हैं और मेोपिया को रोकने में मदद मिलती है।” उन्होंने यह भी सलाह दी है कि माता-पिता बच्चों की स्क्रीन टाइम को नियंत्रित करें और नियमित रूप से आंखों की जांच कराते रहें।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्ट के अनुसार, विश्व भर में मेोपिया के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है और 2050 तक दुनिया की लगभग आधी आबादी मेोपिया की समस्या से ग्रस्त हो सकती है। यह एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य मुद्दा बनता जा रहा है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
शिक्षाविद् और बाल विकास विशेषज्ञ कहते हैं कि बच्चों का बचपन पारंपरिक रूप से बाहर खेलने, दौड़ने-भागने और प्राकृतिक माहौल में रहने से जुड़ा होता था, जो उनकी शारीरिक और मानसिक वृद्धि के लिए जरूरी है। आज की बदलती जीवनशैली और तकनीकी उपकरणों के बढ़ते प्रभाव ने इस प्राकृतिक प्रक्रिया को बाधित कर दिया है।
इस समस्या से निपटने के लिए कई देशों ने स्कूलों में आउटडोर एक्टिविटीज को बढ़ावा देना शुरू कर दिया है। साथ ही, माता-पिता और शिक्षकों को भी जागरूक करना जरूरी है ताकि बच्चे संतुलित और स्वस्थ जीवनशैली अपना सकें।
अंततः, अगर हम बच्चों के स्वास्थ्य और उज्जवल भविष्य को लेकर चिंतित हैं, तो जरूरी है कि हम उनकी दिनचर्या में बदलाव लाएं। उन्हें अधिक समय प्राकृतिक रोशनी में बिताने दें, स्क्रीन टाइम कम करें और स्वस्थ रहने के लिए प्रेरित करें। तभी हम बढ़ती मेोपिया महामारी को रोका जा सकता है और बच्चों का भविष्य सुरक्षित रखा जा सकता है।
