वैज्ञानिक कैसे ‘डीएनए मानचित्र’ का उपयोग कर रहे हैं पैंगोलीन तस्करी केंद्रों का पर्दाफाश करने के लिए
गुवाहाटी, असम
चीन में हुए अंतरराष्ट्रीय जब्त मामलों की जांच से पता चलता है कि ये तस्करी केंद्र न केवल देश के बाहर से, बल्कि भीतर से भी संचालित हो रहे हैं। व्यापक जांच में सामने आया है कि पूर्वोत्तर भारत के अरुणाचल प्रदेश और असम के आसपास के इलाकों से एक जालसाजी नेटवर्क युनान तक पैंगोलीन की तस्करी कर रहा है।
हाल के वर्षों में पैंगोलीन की तस्करी पर कड़ी निगरानी रखी जा रही है, क्योंकि यह दुनिया का एक लुप्तप्राय जीव है जिसकी कांस और मांस की खपत के चलते अवैध व्यापार काफी अधिक है। इससे न केवल इन जीवों की संख्या घट रही है, बल्कि इससे जुड़े तस्करी नेटवर्क भी बड़े पैमाने पर आर्थिक और सुरक्षा संबंधी खतरे पैदा कर रहे हैं।
साइंस और वन विभाग की संयुक्त रिपोर्टों में यह भी खुलासा हुआ है कि चीन के युनान प्रांत में जब्त किए गए पैंगोलीन की डीएनए जांच से उनकी उत्पत्ति पूर्वोत्तर भारत के विविध इलाकों से होने की पुष्टि हुई है। यह पहला मौका है जब डीएनए तकनीक का इस्तेमाल कर तस्करी की इस जटिल कड़ी को उजागर किया गया है, जिससे तस्करों के खिलाफ कार्रवाई करने में स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों को मदद मिली है।
स्थानीय वन अधिकारी और शोधकर्ता इस क्षेत्र में तस्करी को रोकने के लिए लगातार काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि तस्करों के नेटवर्क में स्थानीय ग्रामीण भी शामिल हैं, जिन्हें आर्थिक मजबूरी में ऐसे अवैध कार्यों में शामिल होना पड़ता है। इसलिए, पैंगोलीन संरक्षण के साथ-साथ ग्रामीण विकास योजनाओं को भी जोड़ना आवश्यक है ताकि इस तस्करी को जड़ से खत्म किया जा सके।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्रकार की तकनीकी जांच और क्षेत्रीय समेकन से अधिक प्रभावी रणनीतियाँ बन सकती हैं। साथ ही, पूर्वोत्तर भारत और चीन के बीच काउंटर-तस्करी सहयोग को भी मजबूत किया जाना चाहिए। इस सहयोग से न केवल जैविक विविधता की रक्षा होगी, बल्कि राजनयिक और सुरक्षा हितों की भी रक्षा सुनिश्चित होगी।
इस जालसाजी की जांच और डीएनए मानचित्रण से उम्मीद की जा रही है कि आने वाले समय में पैंगोलीन और अन्य लुप्तप्राय जीवों की तस्करी पर बड़ा प्रहार होगा। स्थानीय वन विभाग और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के सामूहिक प्रयासों से इस अवैध व्यापार को समाप्त करना संभव होगा।
