मेदक चेक के बिना बच्चे को किडनी दान देने के लिए मातृत्व सिद्ध करना आवश्यक नहीं: मद्रास उच्च न्यायालय
चेन्नई, तमिलनाडु। मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए पश्चिम बंगाल के एक मां-बेटा जोड़ी के पक्ष में निर्णय दिया है। यह जोड़ी चेन्नई में होने वाली किडनी प्रत्यारोपण सर्जरी के लिए जा रही थी, जहां मां अपने बच्चे को किडनी दान करना चाहती थीं। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि किडनी दान करने के लिए मातृत्व को डीएनए परीक्षण के माध्यम से साबित करना आवश्यक नहीं है।
इस मामले में मां और पुत्र की ओर से यह तर्क रखा गया था कि उनके पारिवारिक संबंधों को प्रमाणित करने में डीएनए परीक्षण बाधा बन सकता है, जिससे जानलेवा बीमारी से ग्रस्त बच्चे की जीवन रक्षा प्रभावित हो सकती है। उच्च न्यायालय ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए कहा कि माता-पिता और बच्चे के बीच वास्तविक संबंध पर शक करना उचित नहीं होगा, जब तक कि उसके विरुद्ध कोई ठोस साक्ष्य न हो।
न्यायमूर्ति स्वामीनाथन ने अपने आदेश में यह भी उल्लेख किया कि दान करने वाली मां और दाता बच्चे के जीवन की सुरक्षा प्राथमिकता होनी चाहिए। साथ ही, अदालत ने अस्पतालों, डॉक्टरों और विधिक संस्थानों को भी निर्देश दिए कि वे मरीजों और दाताओं के अधिकारों के संरक्षण हेतु मार्गदर्शन का पालन करें।
यह निर्णय उस समय आया है जब पेशेवर चिकित्सा एवं विधिक प्रक्रिया के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक हो जाता है, ताकि मरीजों को आवश्यक स्वास्थ्य सुविधाएं बिना अनावश्यक कानूनी बाधाओं के उपलब्ध हो सकें। पश्चिम बंगाल से आए इस मां-बेटा जोड़ी ने चेन्नई के एक अग्रणी अस्पताल में किडनी प्रत्यारोपण के लिए आवेदन किया था, जहां दान प्रक्रिया से जुड़ी औपचारिकताएं विवादास्पद बन रही थीं। कोर्ट के आदेश ने इस मामले में न केवल राहत दी, बल्कि भविष्य में ऐसे मामलों के लिए भी मिसाल कायम की है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से देश में किडनी दान प्रक्रिया को एक नया संवेदनशील दृष्टिकोण मिलेगा, जो मानवता की सर्वोच्च प्राथमिकता के अनुरूप होगा। साथ ही, यह निर्णय अन्य पारिवारिक दान मामलों में भी न्यायपालिका की समझदारी एवं संवेदनशीलता को दर्शाता है।
इस निर्णय से मिले मार्गदर्शन के कारण, इस जोड़ी की किडनी प्रत्यारोपण प्रक्रिया शीघ्र ही पूरी होने की संभावना है, जो बच्चे के जीवन को बचाने में मदद करेगी। अदालत के इस फैसले को स्वास्थ्य एवं कानूनी क्षेत्र में एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है, जो पारिवारिक दान को सरल और अधिक मानवीय बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
